जिन जिन ब्रज रज सों रति ठानी ।
तिन तिन की सब विधि बन आई, यह प्रत्यक्ष नहिं छानी ॥ [1]
अपनी चरण शरण में राखें, श्रीमति राधे रानी ।
सरसमाधुरी टहल महल की, देंइ महा सुख खानी ॥ [2]
- श्री सरस माधुरी, सरस सागर, धाम महिमा
जिन्होंने ब्रज की रज से प्रेम विकसित किया है, उनकी सब प्रकार से बिगड़ी बन गई है; यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। [1]
ऐसे जीवों को ही श्री राधा रानी अपने चरणों की शरण में सदा रखती हैं और अपना महा सुख प्रदान कर सदा महल की टहल देती हैं। [2]
तिन तिन की सब विधि बन आई, यह प्रत्यक्ष नहिं छानी ॥ [1]
अपनी चरण शरण में राखें, श्रीमति राधे रानी ।
सरसमाधुरी टहल महल की, देंइ महा सुख खानी ॥ [2]
- श्री सरस माधुरी, सरस सागर, धाम महिमा
जिन्होंने ब्रज की रज से प्रेम विकसित किया है, उनकी सब प्रकार से बिगड़ी बन गई है; यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। [1]
ऐसे जीवों को ही श्री राधा रानी अपने चरणों की शरण में सदा रखती हैं और अपना महा सुख प्रदान कर सदा महल की टहल देती हैं। [2]

