(कबित्त)
जाहि निज भक्तन सौ और कोई प्यारौ नाहि,
अज-सिव-दाऊ-बाम जाहि नहिं प्यारी है। [1]
भक्तन के पाछे डोलै, हित की सी बानी बोलै,
प्रेम के अधीन नट-नागर बिहारी है॥ [2]
गोपिन के मन भाई नाना बिधि पूरी करै,
छेड़-छाड़ वाकी सब गोपिन सुखकारी है। [3]
साँवरी सखी! री! तू प्रेम पंथ जानै नहीं,
बोलै पंडिता-सी, पै निपट गँवारी है॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
एक बार श्री कृष्ण एक सखी का वेष धारण कर श्री राधा के पास पहुँचे और अपनी ही निंदा करने लगे। तब श्री राधा रानी कहती हैं -
श्री कृष्ण को अपने भक्तों से बढ़कर कोई अन्य प्रिय नहीं है, जिनके लिए ब्रह्मा, शिव, बलराम और लक्ष्मी भी उतने प्रिय नहीं हैं। [1]
वे अपने भक्तों के पीछे-पीछे चलते हैं और प्रेम भरे शब्द बोलते हैं। नटनागर बिहारी श्री कृष्ण प्रेम के आधीन हैं। [2]
वे गोपियों के मन के भावों को विभिन्न प्रकार से पूर्ण करते हैं। उनकी सभी छेड़छाड़ संबंधी लीलाएँ गोपियों को आनंदित करती हैं। [3]
अरी साँवरी सखी, तू प्रेम का पंथ नहीं जानती। तू बातें तो पंडितों सी करती है, पर है निपट गँवार। [4]
जाहि निज भक्तन सौ और कोई प्यारौ नाहि,
अज-सिव-दाऊ-बाम जाहि नहिं प्यारी है। [1]
भक्तन के पाछे डोलै, हित की सी बानी बोलै,
प्रेम के अधीन नट-नागर बिहारी है॥ [2]
गोपिन के मन भाई नाना बिधि पूरी करै,
छेड़-छाड़ वाकी सब गोपिन सुखकारी है। [3]
साँवरी सखी! री! तू प्रेम पंथ जानै नहीं,
बोलै पंडिता-सी, पै निपट गँवारी है॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
एक बार श्री कृष्ण एक सखी का वेष धारण कर श्री राधा के पास पहुँचे और अपनी ही निंदा करने लगे। तब श्री राधा रानी कहती हैं -
श्री कृष्ण को अपने भक्तों से बढ़कर कोई अन्य प्रिय नहीं है, जिनके लिए ब्रह्मा, शिव, बलराम और लक्ष्मी भी उतने प्रिय नहीं हैं। [1]
वे अपने भक्तों के पीछे-पीछे चलते हैं और प्रेम भरे शब्द बोलते हैं। नटनागर बिहारी श्री कृष्ण प्रेम के आधीन हैं। [2]
वे गोपियों के मन के भावों को विभिन्न प्रकार से पूर्ण करते हैं। उनकी सभी छेड़छाड़ संबंधी लीलाएँ गोपियों को आनंदित करती हैं। [3]
अरी साँवरी सखी, तू प्रेम का पंथ नहीं जानती। तू बातें तो पंडितों सी करती है, पर है निपट गँवार। [4]

