भानु के प्रकास बिना कंज मुख ठाँप रहे - ताज बेगम

भानु के प्रकास बिना कंज मुख ठाँप रहे - ताज बेगम

(कवित्त)
भानु के प्रकास बिना कंज मुख ठाँप रहे,
केतकी की बास बिना भौर दुख सीर हैं। [1]
देखे बिना चन्द के चकोर चित चाय रहे,
स्वाति बूँद चाखे बिना चातक मन पीर हैं॥ [2]
टापक की ज्योति बिना सीस तो पतंग धुनै,
नीर के विछोह मीन कैसे करि जी रहै। [3]
कहे छवि 'ताज' मित्त मानिये हमारी किधौ,
नैननि में देखूँ जब नैनिन में धीर हैं॥ [4]

- ताज़ बेगम (ताज़ बीबी)

सूर्य के प्रकाश के बिना, कमल के फूल की पंखुड़ियाँ बंद रहती हैं, केतकी फूल की सुगंध के बिना, भँवरे दुखी रहते हैं। [1]

चाँद को देखे बिना, चकोर पक्षी का हृदय तड़पता रहता है, स्वाति बूंद का स्वाद लिए बिना, चातक पक्षी का हृदय व्याकुल रहता है। [2]

लौ की प्राप्ति के बिना, पतंगा निराशा में अपना शीश जलाता रहता है, पानी से विलग होकर, मछली कैसे जीवित रह सकती है? [3]

श्री ताज जी कहती हैं, हे सखी, वैसे ही, मेरे नेत्र संतुष्टि तभी पाते हैं जब वे निरंतर श्यामसुंदर के दर्शन करते रहते हैं। [4]