वृन्दावन रस काहि न भावै - श्री जुगलप्रिया जी

वृन्दावन रस काहि न भावै - श्री जुगलप्रिया जी

(राग बहार - ताल तिताला)
वृन्दावन रस काहि न भावै ।
बिटप बल्लरी हरी-हरी त्यों, गिरिवर जमुना क्यों न सुहावै ॥ [1]
खग-मृग-पुंज कुंज-कुंजनि में, श्रीराधावल्लभ के गुन गावै ।
पे हिंसक वचक रंचक यह, सुख सपनेहू लेस न पावै ॥ [2]
धनि ब्रजरज धनि वृन्दावन धनि, रसिक अनन्य जुगल बपु ध्यावै ।
‘जुगलप्रिया' जीवन ब्रज साँचौ, नतरु बादि मृगजलकों धावै ॥ [3]

- श्री जुगलप्रिया जी

ऐसा कौन है जो वृंदावन के रस से मोहित नहीं होगा? हरे-भरे वृक्षों और वल्लरियों से सुसज्जित वृंदावन, गोवर्धन पर्वत, और श्री यमुना आदि किसी को कैसे मनमोहक नहीं लग सकते? [1]

यहाँ के कुंजों और निकुंजों में पक्षियों के झुंड और हिरण आदि श्री राधावल्लभ के गुणों का गान करते हैं। परंतु जो क्रूर, कपटी और दुष्ट जीव हैं, वे स्वप्न में भी इस रस का एक अंश भी अनुभव नहीं कर सकते। [2]

ब्रज की रज धन्य है, वृंदावन धाम धन्य है, जहाँ के रसिक अनन्य सदा युगल स्वरूप (राधा कृष्ण) का ही ध्यान करते हैं। श्री जुगलप्रिया जी कहते हैं कि ब्रज का जीवन ही सच्चा जीवन है; अन्यथा, संसार में समस्त व्यक्ति संसारी पदार्थों की कामनाओं को पूर्ण करने के लिए ऐसे लालायित हैं जैसे कोई मृग सूर्य की किरणों को जल समझकर भागता ही जा रहा है, परंतु वहाँ एक भी बूँद जल नहीं है। [3]