पैसा पापी साधु कौं, परसि लगावै पाप - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (23)

पैसा पापी साधु कौं, परसि लगावै पाप - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (23)

(कुंडलियाँ)
पैसा पापी साधु कौं, परसि लगावै पाप ।
बिमुख करै गुरु इश्ट तै, उपजावै संताप ॥ [1]
उपजावै संताप, ज्ञान बैराग्य बिगारै।
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर सिंगारै ॥ [2]
सब द्रोहिन में सिरै, भक्त द्रोही नहिं ऐसा ।
भगवतरसिक अनन्य, भूल जिन परसी पैसा ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (23)

भगवत रसिक जी कहते हैं कि हे अनन्य रसिक संतो, पैसा पापी होता है, यह छूने भर से ही साधु को पाप लगा देता है। [1]

यह पैसा साधु को उसके इष्ट और गुरु से विमुख कर देता है, और मन में संताप पैदा करता है। यह ज्ञान तथा वैराग्य सबको बिगाड़ देता है। यह पैसा काम, क्रोध, अभिमान, लाभ, मोह और मत्सरता को सजाता है। [2]

पैसे के समान भक्तजन का कोई अहित करने वाला नहीं है, यह सब द्रोहियों का सिरताज है। [3]