मन तू वृंदावन के मारग लागि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (92)

मन तू वृंदावन के मारग लागि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (92)

(राग सारंग, जयति ताल)
मन तू वृंदावन के मारग लागि।
तेरौ न कोऊ न तू काहूकौ, माया मोह तजि भागि॥ [1]
यह कलिकाल व्याल विष भोयौ, जग सोयौ तू जागि ।
भवसागर हरि वोहितकौ तू, होहि कृपाकरि कागि॥ [2]
गो गिरि सर सलिता द्रुम कुंजनि, सौं औरहि अनुरागि ।
व्यास आस करि राधा-धव की, ब्रजवासिन के कौरा माँगि ॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (92)

अरे मन, तू वृंदावन के मार्ग का अनुसरण कर। तेरा यहाँ कोई नहीं है और न ही तू किसी का है; संसारिक मोह-माया को त्याग कर तू भाग चल। [1]

सर्प रूपी कलियुग से विषाक्त होकर संपूर्ण संसार सो रहा है, परंतु तू अब जाग जा। इस भवसागर से पार होने के लिए हरि की कृपा रूपी नाव में बैठ जा, जैसे एक कौवा विशाल समुद्र को पार करने के लिए जहाज पर जाकर बैठ जाता है। [2]

वृंदावन की गायों, पर्वतों, नदियों, वृक्षों और कुंजों से प्रेम उत्पन्न कर। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्री राधावर पर ही एक मात्र आसरा रख और ब्रजवासियों के कौर (मधुकरी) माँग कर खा। [3]