एक दसा एकादसी एक इष्ट व्रत एक - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (640)

एक दसा एकादसी एक इष्ट व्रत एक - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (640)

एक दसा एकादसी, एक इष्ट व्रत एक ।
श्रीबिहारीदास हरिदास कें, भजन अनन्य विवेक ॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (640)

श्री स्वामी हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में सदा काल एक ही इष्ट (श्री बिहारी बिहारिनी) की अनन्य उपासना है एवं एक ही दशा की एकादशी रहती है । अर्थात् इष्ट के प्रसाद का स्वरूप सदा ही एक सा रहता है, यहाँ ऐसा नहीं है कि सब दिन वो प्रसाद रहता है और एकादशी वाले दिन उसको अन्न समझकर त्याग दिया जाता है । अनन्य रसिक जन ऐसा नहीं करते ।