श्रीहरिदास के संगम तीरथ - श्री कान्त रसिक

श्रीहरिदास के संगम तीरथ - श्री कान्त रसिक

(सवैया)
श्रीहरिदास के संगम-तीरथ, कौ न समाई, न सूतक-पातौ। [1]
दूर करौ सुख बैकुंठ कौ, मनमोहन-मोहिनी के सुख रातौ॥ [2]
ना व्रत-नेम न संजम-साधन, मुक्ति कौ मारग हु न सुहातौ। [3]
‘कान्त’ अनेकन सौं न सरै, हम मानत एक निकुंज कौ नातौ॥ [4]

- श्री कान्त रसिक

स्वामी श्री हरिदास जी की विशुद्ध नित्य-विहार उपासना में न तो संगम-तीर्थ (कुंभ स्नान) का महत्व है और न ही सूतक एवं पातक का। [1]

यहाँ तो वैकुण्ठ के सुखों को भी त्याग दिया जाता है। इसमें केवल प्रिया-प्रियतम की निष्काम उपासना से उन्हें सुख देने की ही प्रधानता है। [2]

न व्रत-नियम और न ही अन्य कोई संयम-साधन की आवश्यकता है। यहाँ केवल एक ही नियम ही प्रिया-प्रियतम की निष्काम भाव से सेवा करना। यहाँ तो रसिक को मुक्ति भी नहीं सुहाती। [3]

श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि हमें तो अनेक नाते जँचते नहीं, हम तो केवल एक निकुंज का नाता ही मानते हैं, जिसमें हमारे प्रिया-प्रियतम नित्य-विहार पारायण हैं। [4]