श्यामा प्यारी यह आज्ञा मैं पाऊँ ।
करूना सिंधु श्री नित्य किशोरी, चरन कमल चितलाऊँ ॥ [1]
परिचर्या निज कुंज सदन की, करत न नेंक अघाऊँ ।
अनन्य होय तुब चरन कमल की, और न हिये बसाऊँ ॥ [2]
ऐसी कृपा करो सहचरी पर, दंपति हिय उरझाऊँ ।
अली माधुरी की विनती यह, सुनिये सहज सुभाऊँ ॥ [3]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (6)
हे परम करुणा निधान, नित्य किशोरी, श्री श्यामा प्यारी जू(श्री राधा)! कृपा कर मुझे यह आज्ञा दीजिए कि मैं सदैव अपने मन को आपके चरण कमलों में ही रखूँ । [1]
ऐसी कृपा करो कि आपके कुंज महल की सेवा करते हुए मैं कभी अघाऊँ ना। तुम्हारे चरण कमलों की अनन्य होकर अन्य कुछ भी अपने ह्रदय में न बसाऊँ । [2]
अपनी सहचरी पर ऐसी कृपा करो की मेरा मन दंपति (युगल राधा कृष्ण) में ही सदा अटका रहे । अपने सहज स्वभाव से ही अली माधुरी की इस प्रार्थना को भी स्वीकार कीजिए । [3]
करूना सिंधु श्री नित्य किशोरी, चरन कमल चितलाऊँ ॥ [1]
परिचर्या निज कुंज सदन की, करत न नेंक अघाऊँ ।
अनन्य होय तुब चरन कमल की, और न हिये बसाऊँ ॥ [2]
ऐसी कृपा करो सहचरी पर, दंपति हिय उरझाऊँ ।
अली माधुरी की विनती यह, सुनिये सहज सुभाऊँ ॥ [3]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (6)
हे परम करुणा निधान, नित्य किशोरी, श्री श्यामा प्यारी जू(श्री राधा)! कृपा कर मुझे यह आज्ञा दीजिए कि मैं सदैव अपने मन को आपके चरण कमलों में ही रखूँ । [1]
ऐसी कृपा करो कि आपके कुंज महल की सेवा करते हुए मैं कभी अघाऊँ ना। तुम्हारे चरण कमलों की अनन्य होकर अन्य कुछ भी अपने ह्रदय में न बसाऊँ । [2]
अपनी सहचरी पर ऐसी कृपा करो की मेरा मन दंपति (युगल राधा कृष्ण) में ही सदा अटका रहे । अपने सहज स्वभाव से ही अली माधुरी की इस प्रार्थना को भी स्वीकार कीजिए । [3]

