गौर-साँवरे रसिक दोऊ, यह दीजे सुखरास ।
कबहु नागरीदास अब, तजैं न ब्रज को वास ॥
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (107)
हे सुख सिंधु, गौर साँवरे रसिक दंपति श्री राधा कृष्ण! मुझपर ऐसी कृपा करो कि अब मैं कभी ब्रज का वास त्याग कर कहीं और न जाऊँ ।
कबहु नागरीदास अब, तजैं न ब्रज को वास ॥
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (107)
हे सुख सिंधु, गौर साँवरे रसिक दंपति श्री राधा कृष्ण! मुझपर ऐसी कृपा करो कि अब मैं कभी ब्रज का वास त्याग कर कहीं और न जाऊँ ।

