(राग भैरव)
रसिक अनन्य मुकुट हमरे ।
जय श्री राधा चरनन में, निमें निसदिन रमरे ॥
जिन पद कमल प्रसाद सुखित भये, रही नाँय कछु मन की गमरे ।
कुंवरि चरन सेवा के लायक़, ह्वै हैं श्री वंशी सदृस अधमरे ॥
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (9)
श्री राधा के चरणों की जय हो जिनमें हमारे रसिकों के अनन्य मुकुट मणि, सदा काल, रमें रहते हैं । [1]
जिन श्री चरणों की कृपा प्रसाद से मन का कोई ग़म शेष नहीं रह जाता। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि यह श्री राधा के चरणों का ही प्रताप है कि मुझ जैसा अधम भी इन चरणों की सेवा के लायक़ हो गया ।
रसिक अनन्य मुकुट हमरे ।
जय श्री राधा चरनन में, निमें निसदिन रमरे ॥
जिन पद कमल प्रसाद सुखित भये, रही नाँय कछु मन की गमरे ।
कुंवरि चरन सेवा के लायक़, ह्वै हैं श्री वंशी सदृस अधमरे ॥
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (9)
श्री राधा के चरणों की जय हो जिनमें हमारे रसिकों के अनन्य मुकुट मणि, सदा काल, रमें रहते हैं । [1]
जिन श्री चरणों की कृपा प्रसाद से मन का कोई ग़म शेष नहीं रह जाता। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि यह श्री राधा के चरणों का ही प्रताप है कि मुझ जैसा अधम भी इन चरणों की सेवा के लायक़ हो गया ।

