ललित लड़ैती कुँवरि बिनु, और न कछुक सुहाई ।
नेक नैन की कोर कै, लेनौ चित्त चुराई ॥
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी करुणा कटाक्ष
कुँवरि किशोरिजी (श्री राधा) के अतिरिक्त मेरे मन को और कुछ नहीं सुहाता है । उनकी तिरछी चितवन की एक कोर ही मेरे ह्रदय को चुराने के लिए पर्याप्त है ।
नेक नैन की कोर कै, लेनौ चित्त चुराई ॥
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी करुणा कटाक्ष
कुँवरि किशोरिजी (श्री राधा) के अतिरिक्त मेरे मन को और कुछ नहीं सुहाता है । उनकी तिरछी चितवन की एक कोर ही मेरे ह्रदय को चुराने के लिए पर्याप्त है ।

