आगें कृष्ण, पाछें कृष्ण, इत कृष्ण उत कृष्ण -  श्री छीत स्वामी जी की वाणी (115)

आगें कृष्ण, पाछें कृष्ण, इत कृष्ण उत कृष्ण - श्री छीत स्वामी जी की वाणी (115)

(राग पूरवी)
आगें कृष्ण, पाछें कृष्ण, इत कृष्ण उत कृष्ण
जित देखों तित कृष्ण-मई । [1]
मोर-मुकुट धरें, कुंडल करन भरें
मुरली मधुर धुनि तान नई ॥ [2]
काछिनी काछें लाल, उपरेना पीत पट
तिहि काल सोभा देखि थकित भई। [3]
“छीत-स्वामी” गिरिधरन श्रीविट्ठल
निरखत छवि अँग-अंग छई ॥ [4]

- श्री छीत स्वामी, श्री छीत स्वामी जी की वाणी (115)

श्री कृष्ण आगे हैं, श्री कृष्ण पीछे हैं,
श्री कृष्ण इधर हैं, श्री कृष्ण उधर हैं,
जहाँ भी मैं देखता हूँ, वहाँ केवल श्री कृष्ण ही दिखते हैं। [1]

मोरपंख का मुकुट पहने हुए,
कानों में कुण्डल सजे हुए,
बाँसुरी में नयी-नयी मधुर तान बजाते हुए। [2]

उनकी कमर में काछिनी बंधी हुई है,
पीले वस्त्रों से सुसज्जित हैं;
उनके रूप का दर्शन करते ही, उसी क्षण मैं मोहित हो जाता हूँ। [3]

श्री छीत स्वामी जी कहते हैं, गिरिधर लाल को निहारने से ऐसा प्रतीत होता है 
मानो उनके अंग-प्रतिअंग से छवि बरसती है। [4]