वृंदावन की माधुरी, नित नित नौतन रंग ।
कृष्णदास क्यों पाइए, बिन रसिकन के संग ॥
- श्री कृष्णदास जी
श्री वृंदावन की माधुरी नित्य-नित्य ही नवीन रस को बरसाती है। श्री कृष्णदास जी कहते हैं कि रसिकों के संग के बिना इसे कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता।
कृष्णदास क्यों पाइए, बिन रसिकन के संग ॥
- श्री कृष्णदास जी
श्री वृंदावन की माधुरी नित्य-नित्य ही नवीन रस को बरसाती है। श्री कृष्णदास जी कहते हैं कि रसिकों के संग के बिना इसे कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता।

