कोउक निन्दक कोउक बन्दत - श्री सुंदर जी

कोउक निन्दक कोउक बन्दत - श्री सुंदर जी

(सवैया)
कोउक निन्दक कोउक बन्दत, कोउक देत हैं आय के भक्षण। [1]
कोउक आय लगावत चन्दन, कोउक डारत धूरि तत क्षण॥ [2]
कोउ कहै यह मूरख दीसत, कोउ कहै यह आय विचक्षण। [3]
‘सुन्दर’ काहू सो राग न द्वेष, सोई सब जानहु साधु के लक्षण॥ [4]

- श्री सुंदर जी

कोई उनकी निंदा करता है, कोई श्रद्धा से वंदन करता है, तो कोई भिक्षा अर्पित करता है। [1]

कोई उन्हें चंदन का लेप लगाता है, तो कोई उसी क्षण उनके मुख में धूल झोंक देता है। [2]

कोई उन्हें मूर्ख कहता है, तो कोई उन्हें ज्ञानी कहता है। [3]

श्री सुंदर जी कहते हैं—जिसका हृदय इन सब स्थितियों में भी राग-द्वेष से रहित रहे, उसे ही सच्चा संत समझना चाहिए। [4]