लड़ैती जू की साहिबी अटल बनी ।
याही के सुख में सुख पावत, सुंदर स्याम धनी ॥ [1]
छिन छिन नई नई प्रीति करत अति, कापै परत गनी ।
श्री हरिदासी के संग विलसत, कुंज केलि अपनी ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (105)
लड़ैती जू (श्री राधा) की साहिबी (सर्वोच्चता) अटल बनी हुई है, जिनके सुख में ही श्यामसुन्दर स्वयं का सुख मानते हैं। [1]
अन्य समस्त रसों से मुख मोड़कर, इस अखंड नित्य विहार रस में, क्षण-क्षण नई-नई प्रीति द्वारा लाड़ लड़ाते हैं। श्री ललित किशोरी जी, श्री हरिदासी सखी (ललिता सखी) के संग, इस विहार सुख को, सदा विलसती रहती हैं। [2]
याही के सुख में सुख पावत, सुंदर स्याम धनी ॥ [1]
छिन छिन नई नई प्रीति करत अति, कापै परत गनी ।
श्री हरिदासी के संग विलसत, कुंज केलि अपनी ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (105)
लड़ैती जू (श्री राधा) की साहिबी (सर्वोच्चता) अटल बनी हुई है, जिनके सुख में ही श्यामसुन्दर स्वयं का सुख मानते हैं। [1]
अन्य समस्त रसों से मुख मोड़कर, इस अखंड नित्य विहार रस में, क्षण-क्षण नई-नई प्रीति द्वारा लाड़ लड़ाते हैं। श्री ललित किशोरी जी, श्री हरिदासी सखी (ललिता सखी) के संग, इस विहार सुख को, सदा विलसती रहती हैं। [2]

