(सवैया)
ऐसी करौ नव लाल रंगीले जू, चित्त न और कहूँ ललचाई। [1]
जे दुख सुख रहे लगि देह सौं, ते मिटि जाँई अरु लोक-बड़ाई॥ [2]
संगति-साधु वृंदावन कानन, तौ गुन-गाननि माँझ विहाई। [3]
छबि-कंज-चरन तिहारे बसौ उर, देहु यहै ‘ध्रुव’ कौं ध्रुवताई॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.46)
हे नित्य नव-रंग रंगीले लाल (श्री कृष्ण)! ऐसी कृपा करो कि मेरा यह चित्त आपको छोड़कर अन्यत्र कहीं आकर्षित न हो। [1]
प्रारब्धयोग से प्राप्त होने वाले देह-संभावित सुख-दुःखादि की मुझे प्रतीति भी न हो और लोक-प्रतिष्ठा की भावना भी समाप्त हो जाए। [2]
मेरा जीवन श्री वृन्दावन में रसिक संतों के सत्संग में लगा रहे, जिससे मैं तुम्हारे गुणों का गान करता रहूँ। [3]
आपके सौन्दर्य-राशि चरणारविन्द सदा मेरे हृदय-पटल पर विराजमान रहें, बस इस ध्रुवदास को यही एक अटल स्थिति प्रदान कीजिए। [4]
ऐसी करौ नव लाल रंगीले जू, चित्त न और कहूँ ललचाई। [1]
जे दुख सुख रहे लगि देह सौं, ते मिटि जाँई अरु लोक-बड़ाई॥ [2]
संगति-साधु वृंदावन कानन, तौ गुन-गाननि माँझ विहाई। [3]
छबि-कंज-चरन तिहारे बसौ उर, देहु यहै ‘ध्रुव’ कौं ध्रुवताई॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.46)
हे नित्य नव-रंग रंगीले लाल (श्री कृष्ण)! ऐसी कृपा करो कि मेरा यह चित्त आपको छोड़कर अन्यत्र कहीं आकर्षित न हो। [1]
प्रारब्धयोग से प्राप्त होने वाले देह-संभावित सुख-दुःखादि की मुझे प्रतीति भी न हो और लोक-प्रतिष्ठा की भावना भी समाप्त हो जाए। [2]
मेरा जीवन श्री वृन्दावन में रसिक संतों के सत्संग में लगा रहे, जिससे मैं तुम्हारे गुणों का गान करता रहूँ। [3]
आपके सौन्दर्य-राशि चरणारविन्द सदा मेरे हृदय-पटल पर विराजमान रहें, बस इस ध्रुवदास को यही एक अटल स्थिति प्रदान कीजिए। [4]

