जहँ जहँ चरन धरत प्यारी तूँ हूँ - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (170)

जहँ जहँ चरन धरत प्यारी तूँ हूँ - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (170)

जहँ जहँ चरन धरत प्यारी तूँ हूँ, नैननि पाँवड़े बनाऊँ ।
जब जब चलत सघन बन बीथिन, चुन चुन हूँ मग फूल बिछाऊँ ॥ [1]
जब बैठे प्यारी रूप सिंहासन हूँ, ठाढ़ो सिर चँवर दुराऊँ।
जित चितवत फूलन तन प्यारी हूँ, गुहि भूषन अंग पहिराऊँ ॥ [2]
जब सुंदरि सुख सेज विराजत, पुलकि पुलकि चरनन सहिराऊँ ।
जबहिं ढुरत रस बतियाँ मोसों, अलबेली अलि बलि बलि जाऊँ ॥ [3]

- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (170)

एक सखी श्री राधा से कहती है -
हे प्यारी जू [श्री राधा], जहाँ-जहाँ आप अपने चरणों को रखेंगी, वहाँ-वहाँ मैं अपने नैनों के पाँवड़े बिछाऊँगी।
जब-जब आप सघन कुंजों में विहरेंगी, वहाँ चुन-चुन कर मार्ग में फूलों को बिछाऊँगी। [1]

जब-जब आप अपने सिंहासन पर बैठेंगी, तो आपके संग ही खड़ी होकर चँवर ढुलाऊँगी।
जिन-जिन फूलों को आप निहारेंगी, उनकी माला बनाकर आपके अंगों पर धारण करवाऊँगी। [2]

जब आप सुंदर सेज पर विराजमान होंगी, तब मैं आपके चरणों को पुलकित होकर दबाऊँगी।
श्री अलबेली अलि जी कहती हैं कि हे प्यारी जू, जब आप मुझसे रस भरी बातें करेंगी, तब तो मैं स्वयं को पुनः-पुनः न्यौछावर करूँगी। [3]