जोगी जती तपसी किन होऊ - ब्रज के सवैया

जोगी जती तपसी किन होऊ - ब्रज के सवैया

(सवैया)
जोगी जती तपसी किन होऊ, मुड़ाय के मूड़ फिरौ सब द्वारी। [1]
चाकर है हरि के जगमें, पुनि कूकरते करती अतिभारी॥ [2]
पेट लपेट लटै सिगरे जप, जोग घटे कलिकाल मँझारी। [3]
मोहि भरोसो खरोसो भयो, भजु कुञ्जविहारिन कुञ्जबिहारी॥ [4]

- ब्रज के सवैया

योगी, जती, और तपस्वी होकर, सिर मुंडाकर, हर द्वार पर भिक्षा मांगने से क्या लाभ? [1]

जो लोग हरि की सेवा करते हुए दिखते हैं, वे भी प्रायः सांसारिक इच्छाओं में फंसकर श्वान के समान आचरण करते हैं। [2]

जीव जप, योग आदि तो करते हुए दिखते हैं, पर इस कलिकाल में उनका मन सदा सांसारिक मोह में ही उलझा रहता है। [3]

इन योग, जप, तप आदि से मुझे कोई सरोकार नहीं है। मेरा भरोसा केवल श्री कुंज बिहारी और श्री कुंज बिहारिनी पर है। उन्हें प्रेमपूर्वक लाड़ लड़ाकर, निष्काम भाव से उनका भजन और सेवा करना ही मेरे जीवन का एक मात्र उद्देश्य है। [4]