वृषभानु ललिहिं उर आनिये - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44)

वृषभानु ललिहिं उर आनिये - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44)

वृषभानु ललिहिं उर आनिये ।
नरक, स्वर्ग, अपवर्ग आदि की, खाक वृथा मत छानिये ॥ [1]
तुम हो नित्य किंकरी जिनकी, तिन स्वरूप पहिचानिये ।
अस उदार सरकार न मिलिहैं, उनहिंन स्वामिनि मानिये ॥ [2]
येहि दरबार दीन को आदर, जो जानन चह जानिये ।
कह ‘कृपालु’ यह बात मानि मन ! ललिहिं प्रेम रस सानिये ॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44)

श्री वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) को ही अपने हृदय में बसाओ । विकर्मों द्वारा नरक, सुकर्म द्वारा स्वर्ग एवं ज्ञान द्वारा मोक्षादि की व्यर्थ ही खाक क्यों छान रहे हो ? [1]

तुम जिन श्री किशोरी जी की स्वभावत: नित्य दासी हो, उनके स्वरूप को पहचानो । ऐसी अकारण-करुणामयी, उदार सरकार, तुम्हें कहीं और ढूँढने से भी नहीं मिलेगी । अतएव उन्हीं को अपनी स्वामिनी स्वीकार करो । [2]

श्री राधारानी के दरबार में अपने को दीन मानने वाले का ही आदर होता है – यह विश्वास दृढ़ कर लो । श्री कृपालु जी कहते हैं अरे मन ! तू भी उपर्युक्त बात पर विश्वास करके किशोरी जी के दिव्य प्रेम रस में सराबोर हो जा । [3]