राधा पलिका पौढ़ि है, बैठि पलोटों पाइ ।
अँसुवनि धारा छाड़ि हौं, राधा के गुण गाइ ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (41)
जब श्री राधा अपने पलंग पर शयन कर रही होंगी, तो वहीं पास में बैठकर उनके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाऊँगी । नेत्रों से अश्रु प्रवाहित करते हुए, श्री राधा के गुणों का गान करूँगी ।
अँसुवनि धारा छाड़ि हौं, राधा के गुण गाइ ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (41)
जब श्री राधा अपने पलंग पर शयन कर रही होंगी, तो वहीं पास में बैठकर उनके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाऊँगी । नेत्रों से अश्रु प्रवाहित करते हुए, श्री राधा के गुणों का गान करूँगी ।

