कुंज पधारो प्यारी, भई है अबार ।
सीतल सुरभि समीर बहत, घन बरषत मंद फुहार ॥ [1]
दमकि दामिनी दीप दिखावत, कोइल रही है पुकार ।
केशव-मन प्यारी प्रीतम कौ, नित यह बसौ विहार ॥ [2]
- श्री केशव देव जी
हे प्यारी जू! कुंज में पधारो, अब बहुत देर हो चुकी है । शीतल और सुगंधित समीर बह रही है एवं बादलों से मंद मंद वर्षा की फुहार हो रही है । [1]
दमकती हुई बिजली दीपक की तरह चमक रही है एवं कोयल मधुर गान कर रही है । श्री केशव देव जी प्रार्थना करते हैं कि उनके ह्रदय में नित्य ही प्रीतम प्यारी विहार करते हुए सदा बसें । [2]
सीतल सुरभि समीर बहत, घन बरषत मंद फुहार ॥ [1]
दमकि दामिनी दीप दिखावत, कोइल रही है पुकार ।
केशव-मन प्यारी प्रीतम कौ, नित यह बसौ विहार ॥ [2]
- श्री केशव देव जी
हे प्यारी जू! कुंज में पधारो, अब बहुत देर हो चुकी है । शीतल और सुगंधित समीर बह रही है एवं बादलों से मंद मंद वर्षा की फुहार हो रही है । [1]
दमकती हुई बिजली दीपक की तरह चमक रही है एवं कोयल मधुर गान कर रही है । श्री केशव देव जी प्रार्थना करते हैं कि उनके ह्रदय में नित्य ही प्रीतम प्यारी विहार करते हुए सदा बसें । [2]

