नाहिं मोहि साधन आराधन सुख तीन लोक - श्री हित कृष्णदास जी भावुक की वाणी, श्री वृंदावनष्टक (8)

नाहिं मोहि साधन आराधन सुख तीन लोक - श्री हित कृष्णदास जी भावुक की वाणी, श्री वृंदावनष्टक (8)

(कवित्त)
नाहिं मोहि साधन आराधन सुख तीन लोक,
नाहिं मोहि लीन रवन संपति रजधानी कौ। [1]
नाहिं मोहि चाहन अवगाहन जस आन-आन,
नाहिं मोहि बानि दरस परस खान पानी कौ॥ [2]
(हित) कृष्णदास जोपै प्रभु सींवा तजि बाहिर होंइ,
तऊ हौं न जाऊँ यहै साँची मन मानी कौ। [3]
रहौं कुंज-द्वार दोऊ खेलत सुकुमार जहाँ,
झलमलात वृन्दावन वृन्दावनरानी कौ॥ [4]

- श्री हित कृष्णदास जी, श्री हित कृष्णदास जी भावुक की वाणी, श्री वृंदावनष्टक (8)

मुझे त्रैलोक्य सुख की और उसकी आराधना हेतु किसी भी साधन की आवश्यकता नहीं है। सुन्दर संपत्ति का मुख्य स्थल लेने की भी मुझे आवश्यकता नहीं है। [1]

मुझे किसी अन्य-अन्य के द्वारा अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त करने की भी चाहना नहीं हैं (अथवा मुझे वृन्दावन एवं प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त अन्य किसी के भी सुयश अवगाहन की लालसा नहीं है)। मुझे अपने प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य का दर्शन पर्शन करने की और उनके उच्छिष्ट ग्रहण करने के अतिरिक्त अन्य कहीं खान-पान की भी आदत नहीं है। [2]

श्री हित कृष्णदासजी कहते हैं कि यदि प्रभु भी श्रीवन-सीमा का परित्याग करके कहीं बाहर चले जायें तो भी मैं वृन्दावन छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाऊँगा - यह मेरे मन का दृढ़ निश्चय सत्य संकल्प है। [3]

जहाँ पर वे दोनों सुकुमार सदा क्रीड़ा परायण बने रहते हैं, उसी झलमलाते हुए श्री राधारानी के वृंदावन धाम में, कुंज-द्वार पर मैं भी निरन्तर निवास करता रहूँ। [4]