श्रीकुण्डाश्रयवन्तमन्तरलसत्प्रेमाणमत्यादरात्, लोकेशा: प्रणमन्ति पद्मजमुखा हित्वाभिमानं निजम ।
अन्यत् किं ब्रजराजनन्दनशिरोलग्नांघ्रिसदयावकां, गांधर्वासरसीरसी किल वशीकुर्व्वीत राधामपि ॥
- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (45)
जो अत्यन्त आदर से हृदय में प्रेमोल्लास के साथ श्री राधाकुंड का आश्रय करता है वह परम भाग्यवान् है । ब्रह्मादी लोकपाल देवतागण भी निज अभिमान को छोड़ कर उसको प्रणाम करते हैं । अधिक क्या कहूँ व्रजराज नंदन (श्री कृष्ण) के मस्तक पर अपने चरणों का महावर लगाने वाली श्रीराधिका को भी कुंडवासी अपने वश में कर लेता है ।
अन्यत् किं ब्रजराजनन्दनशिरोलग्नांघ्रिसदयावकां, गांधर्वासरसीरसी किल वशीकुर्व्वीत राधामपि ॥
- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (45)
जो अत्यन्त आदर से हृदय में प्रेमोल्लास के साथ श्री राधाकुंड का आश्रय करता है वह परम भाग्यवान् है । ब्रह्मादी लोकपाल देवतागण भी निज अभिमान को छोड़ कर उसको प्रणाम करते हैं । अधिक क्या कहूँ व्रजराज नंदन (श्री कृष्ण) के मस्तक पर अपने चरणों का महावर लगाने वाली श्रीराधिका को भी कुंडवासी अपने वश में कर लेता है ।

