(दोहा)
दरपन में प्रतिबिंब ज्यौं, नैन जु नैनन माहिं ।
यों प्यारी पिय पलकहू, न्यारे नहिं दरसाहिं ॥
(पद) [तिताल, राग केदारौ]
प्यारी तन स्याम स्यामा तन प्यारौ।
प्रतिबिंबित तन अरस परस दोउ, एक पलक दिषियत नहिं न्यारौ ॥ [1]
ज्यों दरपन में नैन नैन में नैन सहित दरपन दिषवारौ ।
श्रीभट जोट की अति छबि ऊपर, तन मन धन न्यौछावरि डारौ ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (60)
(दोहा)
श्रीप्रिया-प्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंबित नेत्र, देखने वाले के नेत्रों में मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीश्यामाश्याम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं।
(पद)
हे सखी! श्री राधा का तन श्यामसुन्दर में, और श्री श्यामसुन्दर का तन श्री राधा में एकाकार होने के कारण, यह दोनों गौर श्यामल जोड़ी दर्पणवत् हो गई है । ऐसा प्रतीत होता है मानो दोनों मिलकर एक हो गये हैं, एक क्षण को भी विलग नहीं दिखाई देते । [1]
जैसे दर्पण में दिखने वाले नेत्र, देखने वाले के नेत्रों की छवि से मिलकर एक हो जाते हैं, उसी तरह श्री प्रियाप्रियतम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं। श्री प्रिया प्रियतम की एक प्राण दो देही की छवि (जो एक दूसरे का प्रतिबिंब ही है) को निहार कर श्री भट्ट देवाचार्य जी उन पर तन, मन, एवं धन न्यौछावर कर रहे हैं । [2]
दरपन में प्रतिबिंब ज्यौं, नैन जु नैनन माहिं ।
यों प्यारी पिय पलकहू, न्यारे नहिं दरसाहिं ॥
(पद) [तिताल, राग केदारौ]
प्यारी तन स्याम स्यामा तन प्यारौ।
प्रतिबिंबित तन अरस परस दोउ, एक पलक दिषियत नहिं न्यारौ ॥ [1]
ज्यों दरपन में नैन नैन में नैन सहित दरपन दिषवारौ ।
श्रीभट जोट की अति छबि ऊपर, तन मन धन न्यौछावरि डारौ ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (60)
(दोहा)
श्रीप्रिया-प्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंबित नेत्र, देखने वाले के नेत्रों में मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीश्यामाश्याम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं।
(पद)
हे सखी! श्री राधा का तन श्यामसुन्दर में, और श्री श्यामसुन्दर का तन श्री राधा में एकाकार होने के कारण, यह दोनों गौर श्यामल जोड़ी दर्पणवत् हो गई है । ऐसा प्रतीत होता है मानो दोनों मिलकर एक हो गये हैं, एक क्षण को भी विलग नहीं दिखाई देते । [1]
जैसे दर्पण में दिखने वाले नेत्र, देखने वाले के नेत्रों की छवि से मिलकर एक हो जाते हैं, उसी तरह श्री प्रियाप्रियतम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं। श्री प्रिया प्रियतम की एक प्राण दो देही की छवि (जो एक दूसरे का प्रतिबिंब ही है) को निहार कर श्री भट्ट देवाचार्य जी उन पर तन, मन, एवं धन न्यौछावर कर रहे हैं । [2]

