(राग पूर्वी)
लड़ैती मैं सब भाँति तिहारो ।
कबहुँ नहोत मीन मेरो तव छवि जल निधि न्यारो ॥ [1]
भये चकोर नयन छवि निरखति, समुझि समुझि सुधाकर प्यारो।
अपने चरण कमल की भ्रमरी, अलि संकेत विचारो ॥ [2]
- श्री संकेत अली, संकेत लता (64)
हे राधे! मैं हर प्रकार से केवल आपकी ही हूँ। जैसे मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही मेरे मन के लिए आपकी छविनिधि ही जीवनदायिनी है। [1]
मेरे चकोर रूपी नेत्र आपके चन्द्रमुख को निरंतर निहारते रहते हैं। श्री संकेत अली कहती हैं, मेरा मन आपके चरणों में उसी प्रकार आसक्त है जैसे एक भ्रमरी कमल में आसक्त रहती है, कृपा मेरी भी सुधि लीजिए । [2]
लड़ैती मैं सब भाँति तिहारो ।
कबहुँ नहोत मीन मेरो तव छवि जल निधि न्यारो ॥ [1]
भये चकोर नयन छवि निरखति, समुझि समुझि सुधाकर प्यारो।
अपने चरण कमल की भ्रमरी, अलि संकेत विचारो ॥ [2]
- श्री संकेत अली, संकेत लता (64)
हे राधे! मैं हर प्रकार से केवल आपकी ही हूँ। जैसे मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही मेरे मन के लिए आपकी छविनिधि ही जीवनदायिनी है। [1]
मेरे चकोर रूपी नेत्र आपके चन्द्रमुख को निरंतर निहारते रहते हैं। श्री संकेत अली कहती हैं, मेरा मन आपके चरणों में उसी प्रकार आसक्त है जैसे एक भ्रमरी कमल में आसक्त रहती है, कृपा मेरी भी सुधि लीजिए । [2]

