श्री किशोरी जू के अरूनारे दोउ तरवा, मानो अनुरागिन के घरवा ॥ [1]
का गुलाब का कमल कटीलो, का बड़ लाल अनरवा ।
का कुसुम जल बूँद परत ही, बिगरत रंग निचौरवा ॥ [2]
का मखमल का सिरस कलंगी, का मालती पतरवा ।
इनकी कोमलता के आगे, का कपोत बटपरवा ॥ [3]
उर्धव् पदम कल्पतरु अंकुश, रेखन की उजियरवा ।
एक एक रेखन पर वारौं, त्रिभुवन के श्रृंगरवा ॥ [4]
जिनके धोवत डरत देवता, जनु चुइ परत अतरवा ।
इनसे लगन नहीं तो वृथा, दण्ड कमंडल करवा ॥ [5]
- श्री काष्ठजिह्व स्वामी जी
श्री किशोरी जी के अरुण रंग के दोनों चरण के तलवे ऐसे हैं मानो साक्षात प्रेम के घर (धाम) हों । [1]
आश्चर्य होता है कि क्या ये गुलाब के फूल हैं या कमल हैं, या बड़े बड़े लाल अनार हैं ।
ऐसे हैं मानो जैसे फूल पर पानी की बूंद पड़ते ही उसका रंग निचुड़ जाता है। [2]
क्या ये मखमल जैसे हैं अथवा सिरस की कलगी, अथवा मालती के पत्ते हों ।
इनकी कोमलता के आगे कबूतर के पंख भी फीके लगते हैं। [3]
ये ऊर्ध्व कमल की तरह हैं, एवं ऐसे कल्पवृक्ष हैं जिसमें उज्ज्वल रेखाएँ अंकित की गई हों ।
इन चरणों में अंकित एक एक रेखा पर त्रिभुवन के समस्त श्रृंगार को न्यौछावर कर देना चाहिए । [4]
इन चरणों के धोवन से साक्षात देवता भी डरते हैं, ऐसा प्रतीत होता है जैसे इत्र की बूंदें गिर रही हों (अर्थात् कोमलता ऐसी है कि देवता भी उन्हें छूने से डरते हैं कि कहीं चरणों की कोमलता प्रभावित न हो जाय)।
श्री काष्ठ स्वामी कहते हैं कि मेरा वैराग्यपूर्ण जीवन और दंड-कमंडल एवं करुवा आदि धारण करना व्यर्थ है, यदि किशोरीजी के इन श्री चरणों में मेरा अनुराग उत्पन्न न हुआ । [5]
का गुलाब का कमल कटीलो, का बड़ लाल अनरवा ।
का कुसुम जल बूँद परत ही, बिगरत रंग निचौरवा ॥ [2]
का मखमल का सिरस कलंगी, का मालती पतरवा ।
इनकी कोमलता के आगे, का कपोत बटपरवा ॥ [3]
उर्धव् पदम कल्पतरु अंकुश, रेखन की उजियरवा ।
एक एक रेखन पर वारौं, त्रिभुवन के श्रृंगरवा ॥ [4]
जिनके धोवत डरत देवता, जनु चुइ परत अतरवा ।
इनसे लगन नहीं तो वृथा, दण्ड कमंडल करवा ॥ [5]
- श्री काष्ठजिह्व स्वामी जी
श्री किशोरी जी के अरुण रंग के दोनों चरण के तलवे ऐसे हैं मानो साक्षात प्रेम के घर (धाम) हों । [1]
आश्चर्य होता है कि क्या ये गुलाब के फूल हैं या कमल हैं, या बड़े बड़े लाल अनार हैं ।
ऐसे हैं मानो जैसे फूल पर पानी की बूंद पड़ते ही उसका रंग निचुड़ जाता है। [2]
क्या ये मखमल जैसे हैं अथवा सिरस की कलगी, अथवा मालती के पत्ते हों ।
इनकी कोमलता के आगे कबूतर के पंख भी फीके लगते हैं। [3]
ये ऊर्ध्व कमल की तरह हैं, एवं ऐसे कल्पवृक्ष हैं जिसमें उज्ज्वल रेखाएँ अंकित की गई हों ।
इन चरणों में अंकित एक एक रेखा पर त्रिभुवन के समस्त श्रृंगार को न्यौछावर कर देना चाहिए । [4]
इन चरणों के धोवन से साक्षात देवता भी डरते हैं, ऐसा प्रतीत होता है जैसे इत्र की बूंदें गिर रही हों (अर्थात् कोमलता ऐसी है कि देवता भी उन्हें छूने से डरते हैं कि कहीं चरणों की कोमलता प्रभावित न हो जाय)।
श्री काष्ठ स्वामी कहते हैं कि मेरा वैराग्यपूर्ण जीवन और दंड-कमंडल एवं करुवा आदि धारण करना व्यर्थ है, यदि किशोरीजी के इन श्री चरणों में मेरा अनुराग उत्पन्न न हुआ । [5]

