हम तो हैं प्रिय रमण उपासी ।
निर्भय बसें चरण की छाया, सब तें रहत उदासी ॥ [1]
निस दिन मगन रूपरस माते, महदस्थल के वासी ।
‘द्वारकेश’ ना रुचे आन कछु, चरण कमल अभिलाषी ॥ [2]
- श्री द्वारकेश जी
हम अपने प्रिय प्रभु के प्रति समर्पित हैं। निर्भय होकर, हम उनके कमल चरणों की छाया में वास करते हैं, अन्य सब से उदासीन रहते हैं। [1]
रात दिन, हम उनकी रूप माधुरी का पान कर मगन रहते हैं एवं सदा ब्रज में ही वास करते हैं ।श्री द्वारकेशजी कहते हैं कि अब मुझे अन्य कुछ नहीं रुचिकर है, मुझे बस मेरे प्रभु के चरण कमलों की ही अभिलाषा है । [2]
निर्भय बसें चरण की छाया, सब तें रहत उदासी ॥ [1]
निस दिन मगन रूपरस माते, महदस्थल के वासी ।
‘द्वारकेश’ ना रुचे आन कछु, चरण कमल अभिलाषी ॥ [2]
- श्री द्वारकेश जी
हम अपने प्रिय प्रभु के प्रति समर्पित हैं। निर्भय होकर, हम उनके कमल चरणों की छाया में वास करते हैं, अन्य सब से उदासीन रहते हैं। [1]
रात दिन, हम उनकी रूप माधुरी का पान कर मगन रहते हैं एवं सदा ब्रज में ही वास करते हैं ।श्री द्वारकेशजी कहते हैं कि अब मुझे अन्य कुछ नहीं रुचिकर है, मुझे बस मेरे प्रभु के चरण कमलों की ही अभिलाषा है । [2]

