वस्तुतः प्रेयसी प्रेष्ठप्रेमामृतरसात्सकम् ।
वृन्दावनस्वरूपं हि विज्ञेयं रसिकप्रियम ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (6.4)
वास्तव में प्रिया श्री राधा एवं प्रियतम श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के पारस्परिक प्रेम का जो आंतरिक अमृतमय रस है, वही श्री वृंदावन का स्वरूप है । इसीलिए यह वृंदावन रसिक जनों की प्रीति का विषय है ।
वृन्दावनस्वरूपं हि विज्ञेयं रसिकप्रियम ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (6.4)
वास्तव में प्रिया श्री राधा एवं प्रियतम श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के पारस्परिक प्रेम का जो आंतरिक अमृतमय रस है, वही श्री वृंदावन का स्वरूप है । इसीलिए यह वृंदावन रसिक जनों की प्रीति का विषय है ।

