लाल करत तेरे गुन गानैं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (21)

लाल करत तेरे गुन गानैं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (21)

(राग सारंग)
लाल करत तेरे गुन गानैं।
जो न पत्याहु, सपथ नहिं मानति,
चली सुनि अपने कानैं ॥ [1]
जो तुम स्याम होहु वे स्यामा,
तौ यह बेदन जानैं ।
श्रीबीठलविपुल विनोद बिहारी,
सौं बादि रूसनौ ठानैं ॥ [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (21)

श्री लाल जी (श्री कृष्ण) की रस पिपासु दैन्य स्थिति जान कर विट्ठल विपुल सखी माननी श्री प्रिया जी (श्री राधा) से बोलीं -
हे प्यारी जू, मैं शपथ खाकर कहती हूँ कि श्री लाल जी तो सदा आपका ही गुणगान करते रहते हैं। यदि आपको मेरी वाणी और शपथपूर्वक कहने पर भी विश्वास नहीं हो रहा है तो आप चलकर स्वयं अपने कानों से सुन लीजिए। [1]

हे प्यारी जू! यदि कहीं आप श्री लाल जी के रूप में हों और वे आपके रूप में आ जाएँ, तो आपको प्रियतम के ह्रदय की वेदना का आभास हो सकेगा। अतः, हे प्यारी! ऐसे प्रियतम से मान का शीघ्रता पूर्वक त्याग कर, प्रेमरस युक्त विनोद का तत्क्षण वर्धन कर, उनसे मिलन कीजिए। [2]