कुँवरि-कुँवर दोउ रसिक वर, सब सखियनि के प्रान ।
दंपति सुख सुख जिनहिं के, नाहिंन गति कछु आन ॥
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, ब्रज लीला (188)
युगल रसिकवर किशोर एवं किशोरी समस्त सखियों के प्राण हैं । इस रसिक दम्पति का सुख ही तत्सुखमयी सखियों का आस्वाद सुख है । इस सुख के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई गति-मति ही नहीं है ।
दंपति सुख सुख जिनहिं के, नाहिंन गति कछु आन ॥
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, ब्रज लीला (188)
युगल रसिकवर किशोर एवं किशोरी समस्त सखियों के प्राण हैं । इस रसिक दम्पति का सुख ही तत्सुखमयी सखियों का आस्वाद सुख है । इस सुख के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई गति-मति ही नहीं है ।

