प्रथमहि भावुक भाव विचारै ।
बनि तन नव किशोर सहचरि वपु,
हित गुरु कृपा निहारै ॥ [1]
भूषण वसन प्रसाद स्वामिनी,
पुलकि पुलकि अंग धारै ।
जयश्री रूपलाल हित ललित त्रिभंगी,
रंगी रस विस्तारै ॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी कहते हैं कि रस उपासक को भजन आरंभ करने से पूर्व अपने सहज सखी भाव का विचार करना चाहिए। अपने श्री गुरु की कृपा मानकर, अपने मन से उसे नव किशोर अवस्था वाली सहचरी के रूप में अनुभव करना चाहिए। [1]
इसके बाद उसे अपनी स्वामिनी श्री राधा द्वारा प्रसाद रूप में दिए गए आभूषण और वस्त्रों को रोमांचित होकर उस सहचरी शरीर पर धारण करना चाहिए। जब साधक इस प्रकार से सहचरी बपु को मन से धारण कर ले, तब उसे श्री श्यामा-श्याम की ललित रस लीलाओं का अवलोकन करना चाहिए, जिससे साधक उस रस को अनुभव में ला सकेगा। [2]
बनि तन नव किशोर सहचरि वपु,
हित गुरु कृपा निहारै ॥ [1]
भूषण वसन प्रसाद स्वामिनी,
पुलकि पुलकि अंग धारै ।
जयश्री रूपलाल हित ललित त्रिभंगी,
रंगी रस विस्तारै ॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी कहते हैं कि रस उपासक को भजन आरंभ करने से पूर्व अपने सहज सखी भाव का विचार करना चाहिए। अपने श्री गुरु की कृपा मानकर, अपने मन से उसे नव किशोर अवस्था वाली सहचरी के रूप में अनुभव करना चाहिए। [1]
इसके बाद उसे अपनी स्वामिनी श्री राधा द्वारा प्रसाद रूप में दिए गए आभूषण और वस्त्रों को रोमांचित होकर उस सहचरी शरीर पर धारण करना चाहिए। जब साधक इस प्रकार से सहचरी बपु को मन से धारण कर ले, तब उसे श्री श्यामा-श्याम की ललित रस लीलाओं का अवलोकन करना चाहिए, जिससे साधक उस रस को अनुभव में ला सकेगा। [2]

