कृपा-कादंबिनी जमुना बिराजै - घनानंद ग्रंथावली

कृपा-कादंबिनी जमुना बिराजै - घनानंद ग्रंथावली

कृपा-कादंबिनी जमुना बिराजै ।
मोद-मूरति दरस प्रेम पूरित परस स्याम
रस विमल जस संपदा साजै ॥ [1]
अद्भुत अनूप भूतल लसति बसति
नित हेतमय नाम कें लेत भ्रम भाजै ।
आनंदघन घमँडि तीर बिहरत
रमडि ब्रजबधू बसकरन बंसिका गाजै ॥ [2]

- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली

कृपा की कादम्बिनी के समान यमुना जी शोभायमान है । यह उल्लास की मूर्ति हैं, इनके दर्शन मात्र से हृदय प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है। श्री कृष्ण के स्पर्श के कारण यह विशुद्ध प्रेम प्रदान करने वाली है और विमल रस दात्री हैं। इस धराधाम में यह श्री कृष्ण के यश-वैभव के रूप में विराजमान है। [1]

यह पृथ्वी पर अत्यन्त अद्भुत और अनुपम शोभा से युक्त होकर निवास करती है । यह नित्य कल्याणकारिणी है जिनका नाम लेते ही समस्त भ्रम दूर हो जाते हैं।
श्री आनन्दघन कहते हैं कि इनके तट पर विहरण करने से हृदय में आनन्द के घन घुमड़ने लगते हैं और सुन्दर ब्रजबालाओं को वश में करने वाली श्री कृष्ण की वंशी ध्वनि गूँजती रहती है । [2]