इहिं व्रज यह रस नित्य है, मैं अब समुझ्यौ आइ ।
वृंदावन रज ह्वै रहौं, ब्रह्मलोक न सुहाइ ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
ब्रह्मा जी कहते हैं, “हे प्रभु (श्री कृष्ण)! मैंने अब यह समझ लिया है कि इस व्रज में यह रस नित्य है, क्षणिक नहीं है। अतः मैं वृंदावन की रज बनकर यहीं रहना चाहता हूँ। अब मुझे ब्रह्मलोक अच्छा नहीं लगता।”
वृंदावन रज ह्वै रहौं, ब्रह्मलोक न सुहाइ ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
ब्रह्मा जी कहते हैं, “हे प्रभु (श्री कृष्ण)! मैंने अब यह समझ लिया है कि इस व्रज में यह रस नित्य है, क्षणिक नहीं है। अतः मैं वृंदावन की रज बनकर यहीं रहना चाहता हूँ। अब मुझे ब्रह्मलोक अच्छा नहीं लगता।”

