तेरे रूप सम औरु नहीं - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (46)

तेरे रूप सम औरु नहीं - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (46)

(राग टोडी)
तेरे रूप सम औरु नहीं
खेंचों हठि रेखी ।
अंग-अंग लावन्य-सदन सखि
भ्रूविलास त्रिभुवन श्रीसेखी ॥ [1]
ता छिन तें कछु और बिमल छबि
जा छिन तैं गिरिधर पिय देखी ।
'कृष्णदास’ प्रभु रसिक-मुकुटमनि
सुरति मूरति हृदयांतर लेखी ॥ [2]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (46)

एक सखी श्री राधा से कहती है - 
तुम्हारी जैसी सुंदरता और कोई नहीं है। तुम्हारे अंग-अंग सुंदरता के सदन हैं। हे सखी, तुम्हारी चपल भौहें ऐसी अनियारी हैं कि तीनों लोक वशीभूत हो जाते हैं और उन पर शासन करती हैं। [1]

जिस क्षण से गिरिधर लाल (श्री कृष्ण) ने तुम पर दृष्टि डाली, तुम्हारी सुंदरता ने समस्त सीमाओं को पार कर दिया है। श्री कृष्णदास कहते हैं कि रसिक शिरोमणि भगवान श्री कृष्ण ने तुम्हारी रूप माधुरी को सदा-सदा के लिए अपने हृदय की गहराई में अंकित कर लिया है। [2]