(राग सारंग)
प्यारी लागै श्रीवृन्दावन की धूरि ।
राधे जू रानी मोहन राजा, राज सदा भरिपूरि ॥ [1]
कनक-कलस करुवा महमूँदी, खासा ब्रज-कमरिनु की चूरि ।
‘व्यासहिं’ श्रीहरिवंश बताई, अपनी जीवनमूरि ॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (14)
मुझे श्री वृन्दावन की धूलि (रज) ही प्यारी लगती है । इस वृंदावन धाम की रानी श्री राधा हैं एवं राजा मोहन हैं जिनका राज सदा भरपूर है । [1]
यहां की रज का करुवा स्वर्ण कलश के समान पवित्र है और रज ब्रज कमलों की चूर - पराग है जो महमूदी खासा कपड़े के समान कोमल है ।(श्री व्यासजी के काल में “महमूदी ख़ासा” नामक अत्यंत नर्म मलमल होती थी) । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्रीहरिवंश महाप्रभु जी ने इस रज को ही अपनी जीवन मूल बताया है । [2]
प्यारी लागै श्रीवृन्दावन की धूरि ।
राधे जू रानी मोहन राजा, राज सदा भरिपूरि ॥ [1]
कनक-कलस करुवा महमूँदी, खासा ब्रज-कमरिनु की चूरि ।
‘व्यासहिं’ श्रीहरिवंश बताई, अपनी जीवनमूरि ॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (14)
मुझे श्री वृन्दावन की धूलि (रज) ही प्यारी लगती है । इस वृंदावन धाम की रानी श्री राधा हैं एवं राजा मोहन हैं जिनका राज सदा भरपूर है । [1]
यहां की रज का करुवा स्वर्ण कलश के समान पवित्र है और रज ब्रज कमलों की चूर - पराग है जो महमूदी खासा कपड़े के समान कोमल है ।(श्री व्यासजी के काल में “महमूदी ख़ासा” नामक अत्यंत नर्म मलमल होती थी) । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्रीहरिवंश महाप्रभु जी ने इस रज को ही अपनी जीवन मूल बताया है । [2]

