(सवैया)
चित चोर! छिपोगे कहाँ तक यों, हमें शान्ति नहीं प्रगटाये बिना। [1]
हम छोड़ेंगे ध्यान तुम्हारा नहीं, नहीं मानेंगे श्याम बुलाये बिना॥ [2]
नहीं छाती की ज्वाला मिटेगी प्रभो! तुमको इससे लिपटाये बिना। [3]
यह जीवन प्यास बुझेगी नहीं, चरणामृत प्यारे पिलाये बिना॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
हे चितचोर (श्यामसुंदर)! कहाँ तक छिपोगे, हमारे हृदय को तब तक शांति नहीं मिलेगी जब तक तुम हमें प्रकट रूप से दर्शन नहीं देते। [1]
हम तुम्हारा ध्यान करना छोड़ेंगे नहीं और तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक हम तुमसे मिल न लें। [2]
हमारे हृदय की अग्नि तब तक नहीं मिटेगी, हे प्रभु, जब तक हम तुम्हें साक्षात अपने हृदय से नहीं चिपटा लेते। [3]
यह जीवन की प्यास तब तक नहीं बुझेगी, जब तक तुम स्वयं आकर हमें अपना चरणामृत नहीं पिला देते। [4]
चित चोर! छिपोगे कहाँ तक यों, हमें शान्ति नहीं प्रगटाये बिना। [1]
हम छोड़ेंगे ध्यान तुम्हारा नहीं, नहीं मानेंगे श्याम बुलाये बिना॥ [2]
नहीं छाती की ज्वाला मिटेगी प्रभो! तुमको इससे लिपटाये बिना। [3]
यह जीवन प्यास बुझेगी नहीं, चरणामृत प्यारे पिलाये बिना॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
हे चितचोर (श्यामसुंदर)! कहाँ तक छिपोगे, हमारे हृदय को तब तक शांति नहीं मिलेगी जब तक तुम हमें प्रकट रूप से दर्शन नहीं देते। [1]
हम तुम्हारा ध्यान करना छोड़ेंगे नहीं और तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक हम तुमसे मिल न लें। [2]
हमारे हृदय की अग्नि तब तक नहीं मिटेगी, हे प्रभु, जब तक हम तुम्हें साक्षात अपने हृदय से नहीं चिपटा लेते। [3]
यह जीवन की प्यास तब तक नहीं बुझेगी, जब तक तुम स्वयं आकर हमें अपना चरणामृत नहीं पिला देते। [4]

