(कवित्त)
काहू कै पूजा को आस काहू कैं बिषै बिलास,
काहू कैं उदिम श्रम ग्रह बन बास कौ। [1]
कोऊ महातम ग्याँन कोऊ मन धरै ध्यान
कोऊ साधन विधाँन दिन तन त्रास कौ॥ [2]
काहू कैं नामैं निरबाहु कोऊ पोथी अवगाहु
कोऊ दरस कौं जाहु पै परस न पास कौ। [3]
पाछैं न सुन्यौं अब आगैं हूँ ह्वैं है ना ऐसौ कैसौ
भैया जैसौ निजु महल श्रीस्वामी हरिदास कौ॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (12)
कोई तो पूजा में ही सतत आशा लगाये हुए है, कोई बेचारे इस लोक एवं स्वर्ग आदि के विषय विलास लालसाओं में लगे हुए हैं। कोई घर में, कोई जहां तहाँ वन में जाकर नाना प्रकार के श्रम कर रहा है। [1]
कोई महात्म ज्ञान तो कोई भगवान के ध्यान में ही लगा हुआ है। बहुत से लोग नाना प्रकार की साधनाओं एवं विधि विधान करके अपने तन को कष्ट दे रहे हैं। [2]
बहुत से लोग नाम को ही निभाने में लगे हुए हैं तो कोई सतत पोथी का ही पाठ किए जा रहा है ।कोई मंदिर में जाकर दर्शन करने मात्र में ही अपना संतोष मानता फिरता है। इतना सब करते हुए भी बिना सच्चे भाव के साक्षात प्रेम स्वरूप श्री बिहारीजी महाराज का उसे सपरस प्राप्त नहीं हो पा रहा है। [3]
श्री स्वामी जी (स्वामी हरिदासजी) के अति विशुद्ध प्रेममय एकांत रस-विलास निजमहल को पहले तो कभी सुना नहीं गया और आगे भी ऐसा कहीं होगा नहीं क्योंकि इस महल का अखंड नित्य विहार रस अपने आप में अद्वितीय है। अर्थात् युगल को इस निज महल के अतिरिक्त अन्य कुछ और (निज महल के बाहर) सुख सुहाता नहीं। [4]
काहू कै पूजा को आस काहू कैं बिषै बिलास,
काहू कैं उदिम श्रम ग्रह बन बास कौ। [1]
कोऊ महातम ग्याँन कोऊ मन धरै ध्यान
कोऊ साधन विधाँन दिन तन त्रास कौ॥ [2]
काहू कैं नामैं निरबाहु कोऊ पोथी अवगाहु
कोऊ दरस कौं जाहु पै परस न पास कौ। [3]
पाछैं न सुन्यौं अब आगैं हूँ ह्वैं है ना ऐसौ कैसौ
भैया जैसौ निजु महल श्रीस्वामी हरिदास कौ॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (12)
कोई तो पूजा में ही सतत आशा लगाये हुए है, कोई बेचारे इस लोक एवं स्वर्ग आदि के विषय विलास लालसाओं में लगे हुए हैं। कोई घर में, कोई जहां तहाँ वन में जाकर नाना प्रकार के श्रम कर रहा है। [1]
कोई महात्म ज्ञान तो कोई भगवान के ध्यान में ही लगा हुआ है। बहुत से लोग नाना प्रकार की साधनाओं एवं विधि विधान करके अपने तन को कष्ट दे रहे हैं। [2]
बहुत से लोग नाम को ही निभाने में लगे हुए हैं तो कोई सतत पोथी का ही पाठ किए जा रहा है ।कोई मंदिर में जाकर दर्शन करने मात्र में ही अपना संतोष मानता फिरता है। इतना सब करते हुए भी बिना सच्चे भाव के साक्षात प्रेम स्वरूप श्री बिहारीजी महाराज का उसे सपरस प्राप्त नहीं हो पा रहा है। [3]
श्री स्वामी जी (स्वामी हरिदासजी) के अति विशुद्ध प्रेममय एकांत रस-विलास निजमहल को पहले तो कभी सुना नहीं गया और आगे भी ऐसा कहीं होगा नहीं क्योंकि इस महल का अखंड नित्य विहार रस अपने आप में अद्वितीय है। अर्थात् युगल को इस निज महल के अतिरिक्त अन्य कुछ और (निज महल के बाहर) सुख सुहाता नहीं। [4]

