विदग्ध सुन्दरी-बृन्द वर चूडामणे कदा ।
महारसनिधे राधे पदमाराधये तव ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (36)
चतुर सुन्दरी-बृन्द की श्रेष्ठ चूड़ामणि रूपा श्रीराधे स्वामिनि ! हे महारस-निधे ! मैं कब आपके चरणों का आराधन (सेवन) करूँगी ?
महारसनिधे राधे पदमाराधये तव ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (36)
चतुर सुन्दरी-बृन्द की श्रेष्ठ चूड़ामणि रूपा श्रीराधे स्वामिनि ! हे महारस-निधे ! मैं कब आपके चरणों का आराधन (सेवन) करूँगी ?

