सर्वोपरि वृंदावन रसु है।
रसिक अनन्य पाइ बल गाजत, या रस हीन अंध मनु पसु है ॥ [1]
सिव बिरंचि नारद सुक बरनों, श्रीमुख हूँ गायौ बन रसु है ।
‘वृंदावन हित’ रूप व्यास सुत, सुमति सच्यौ सोई सर्वसु है ॥ [2]
- चाचा वृन्दावन दास जी
सर्वोपरि श्री धाम वृंदावन का रस है। रसिक अनन्यों ने इसे पाकर, इसके बल से गर्जना की है, और इस रस से वंचित मन को एक अंधे पशु के समान बताया है। [1]
शिव, ब्रह्मा, नारद, शुकदेव आदि ने इस वृंदावन रस का वर्णन और गायन अपने श्री मुख से किया है। श्री हित वृंदावन दास जी कहते हैं कि व्यास सुत अर्थात् श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने साँची मति से इस रस को अपना सर्वस्व (जीवन प्राण) बताया है । [2]
रसिक अनन्य पाइ बल गाजत, या रस हीन अंध मनु पसु है ॥ [1]
सिव बिरंचि नारद सुक बरनों, श्रीमुख हूँ गायौ बन रसु है ।
‘वृंदावन हित’ रूप व्यास सुत, सुमति सच्यौ सोई सर्वसु है ॥ [2]
- चाचा वृन्दावन दास जी
सर्वोपरि श्री धाम वृंदावन का रस है। रसिक अनन्यों ने इसे पाकर, इसके बल से गर्जना की है, और इस रस से वंचित मन को एक अंधे पशु के समान बताया है। [1]
शिव, ब्रह्मा, नारद, शुकदेव आदि ने इस वृंदावन रस का वर्णन और गायन अपने श्री मुख से किया है। श्री हित वृंदावन दास जी कहते हैं कि व्यास सुत अर्थात् श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने साँची मति से इस रस को अपना सर्वस्व (जीवन प्राण) बताया है । [2]

