पहचानै हरि कौन, मो से अनपहचान कों।
त्यौं पुकार मधि-मौन, कृपा-कान मधि नैंन ज्यौं॥
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली
हे हरि! मुझ जैसे अपरिचित को कौन पहचान सकता है। जिस प्रकार आपके नेत्रों के बीच कृपा रूपी कान छिपे हुए हैं, उसी प्रकार मेरे मौन में पुकार छुपी हुई है। (अर्थात, मेरे बिना कहे ही आप अपने नेत्रों में छिपे कृपा रूपी कानों से सब सुन और समझकर कृपा करते हो। ऐसा अन्य कोई नहीं कर सकता।)
त्यौं पुकार मधि-मौन, कृपा-कान मधि नैंन ज्यौं॥
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली
हे हरि! मुझ जैसे अपरिचित को कौन पहचान सकता है। जिस प्रकार आपके नेत्रों के बीच कृपा रूपी कान छिपे हुए हैं, उसी प्रकार मेरे मौन में पुकार छुपी हुई है। (अर्थात, मेरे बिना कहे ही आप अपने नेत्रों में छिपे कृपा रूपी कानों से सब सुन और समझकर कृपा करते हो। ऐसा अन्य कोई नहीं कर सकता।)

