ये ब्रजबासी हरि के प्यारे - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (125)

ये ब्रजबासी हरि के प्यारे - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (125)

(राग-केदारौ, ताल-त्रिताल)
ये ब्रजबासी हरि के प्यारे।
वे हरि में, हरि इनमें नित प्रति, पल छिन होत न न्यारे ॥ [1]
इंद्र आदि सुर, असुर, दवानल, विषजल तैं जु उबारे।
नागरिदास किते या ब्रज पर, पचि-पचि गये बिचारे॥ [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (125)

ये ब्रजवासी श्री हरि के प्यारे हैं। वे हरि में हैं, और हरि उनमें सदा रहते हैं, एक क्षण को भी नहीं बिछड़ते। [1]

इंद्र आदि देव और अन्य असुरों के प्रकोप से हुई वर्षा, दावानल, विषजल आदि से भगवान श्री कृष्ण ने सदा इन ब्रजवासियों की रक्षा की है। श्री नागरीदास कहते हैं कि जिन्होंने भी इन ब्रजवासियों का कुछ अहित करना चाहा, उन बेचारों को बार बार असफलता ही मिली है। [2]