राधा अंग सिंगार हौं, जावक दैहौं पाँव ।
राधा ही सों झगर हौं, मोहि नहीं कहूँ ठाँव ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (38)
श्री राधा के अंगों को श्रृंगार कर, उनके चरणों में जावक लगाती हूँ। कभी कभी श्री राधा से ही प्रेमपूर्वक झगड़ा भी करती हूँ क्योंकि उनके अतिरिक्त मेरी और कहीं कोई ठौर नहीं है।
राधा ही सों झगर हौं, मोहि नहीं कहूँ ठाँव ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (38)
श्री राधा के अंगों को श्रृंगार कर, उनके चरणों में जावक लगाती हूँ। कभी कभी श्री राधा से ही प्रेमपूर्वक झगड़ा भी करती हूँ क्योंकि उनके अतिरिक्त मेरी और कहीं कोई ठौर नहीं है।

