यही कर्म यही धर्म है, यही उपासन ज्ञान ।
कै ब्रजसुख इन दृग लहों, कै छुटि पहुँचें प्रान ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (99)
यही कर्म है, यही धर्म है, और यही उपासना का ज्ञान है कि या तो मैं इन नयनों से ब्रज रस का पान करूँ या मेरे प्राण निकल जाएँ। अर्थात्, इस मानव देह का क्या महत्व यदि ब्रज रस को प्राप्त ही ना किया?
कै ब्रजसुख इन दृग लहों, कै छुटि पहुँचें प्रान ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (99)
यही कर्म है, यही धर्म है, और यही उपासना का ज्ञान है कि या तो मैं इन नयनों से ब्रज रस का पान करूँ या मेरे प्राण निकल जाएँ। अर्थात्, इस मानव देह का क्या महत्व यदि ब्रज रस को प्राप्त ही ना किया?

