राधा नाम रटो मुख वानी ।
कपा दृष्टि करि कुंवरि किशोरी, वास देत रजधानी ॥ [1]
जप तप तीरथ कोटि व्रत पूजा, या सम नाहिं तुलानी ।
वेद पुरान सार शास्त्रन कौ, महा मधुर रस दानी ॥ [2]
अस उदार, न ऐसौ कोऊ, जस मम राधा रानी ।
‘जुगलसहचरी' की सरबस स्वामिनि, तिन ही हाथ बिकानी ॥ [3]
- श्री जुगल सहचरी
अपने मुख-वाणी से श्री राधा का नाम उच्चारण करो। जब श्री राधा अपनी करुणामयी दृष्टि डालती हैं तभी उनके राजधानी श्री धाम वृंदावन का वास मिलता है । [1]
कोई जप, तप, तीर्थयात्रा, अनगिनत व्रत, एवं पूजा इसकी बराबरी नहीं कर सकता क्योंकि यह वेदों, पुराणों और शास्त्रों का सार है, जो महामधुर रस को प्रदान करता है। [2]
मेरी राधा रानी के समान उदार कोई भी नहीं है। श्री जुगल सखी कहती हैं, “मेरा सर्वस्व स्वामिनी श्री राधा हैं, जिनके हाथों मैं सदा के लिए बिक चुकी हूँ।” [3]
कपा दृष्टि करि कुंवरि किशोरी, वास देत रजधानी ॥ [1]
जप तप तीरथ कोटि व्रत पूजा, या सम नाहिं तुलानी ।
वेद पुरान सार शास्त्रन कौ, महा मधुर रस दानी ॥ [2]
अस उदार, न ऐसौ कोऊ, जस मम राधा रानी ।
‘जुगलसहचरी' की सरबस स्वामिनि, तिन ही हाथ बिकानी ॥ [3]
- श्री जुगल सहचरी
अपने मुख-वाणी से श्री राधा का नाम उच्चारण करो। जब श्री राधा अपनी करुणामयी दृष्टि डालती हैं तभी उनके राजधानी श्री धाम वृंदावन का वास मिलता है । [1]
कोई जप, तप, तीर्थयात्रा, अनगिनत व्रत, एवं पूजा इसकी बराबरी नहीं कर सकता क्योंकि यह वेदों, पुराणों और शास्त्रों का सार है, जो महामधुर रस को प्रदान करता है। [2]
मेरी राधा रानी के समान उदार कोई भी नहीं है। श्री जुगल सखी कहती हैं, “मेरा सर्वस्व स्वामिनी श्री राधा हैं, जिनके हाथों मैं सदा के लिए बिक चुकी हूँ।” [3]

