छाँड़ि नेह नंदलाल कौ, हम नहिं चाहत जोग ।
रंग-बाति क्यों लेत हैं, रतन-पारखी लोग ॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (622)
एक गोपी कहती है, “नंदलाल श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम को त्याग कर हम योग नहीं चाहती। जो रत्न के पारखी होते हैं, भला वे रंग बाती (शरीर में लगाई जाने वाली सुगंधित वस्तुओं की बत्ती) का क्या करेंगे?”
रंग-बाति क्यों लेत हैं, रतन-पारखी लोग ॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (622)
एक गोपी कहती है, “नंदलाल श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम को त्याग कर हम योग नहीं चाहती। जो रत्न के पारखी होते हैं, भला वे रंग बाती (शरीर में लगाई जाने वाली सुगंधित वस्तुओं की बत्ती) का क्या करेंगे?”

