रंग हिडोरना री झूलत लाडिली पिय के संग ।
मंद मंद झूलत फूलति है, पहिरें बसन सुरंग ॥ [1]
अंग अंग सुख बरषत हरषत, छवि को उठत तरंग ।
सुख में झूलत कुंवर किसोरी, भरि भरि लेत उछंग ॥ [2]
श्री ललितमोहनी प्यारी पिय की निरखत केलि अभंग ॥ [3]
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (66)
प्यारीजी (श्री राधा) प्रियतम (श्री कृष्ण) के साथ रंग (रस-विलास) के हिंडोले पर झूल रही हैं। सुन्दर रंग के वस्त्र धारण किये हुए वे मंद-मंथर गति से झूमती हुई प्रफुल्लित हो रही हैं। [1]
उनके अंग-अंग से आनन्द की वर्षा हो रही है। जब वे हँसती हैं, तो छवि की तरंगें उठने लगती हैं । रस-विलास के इस सर्वोपरि सुख में झूलते हुए ये किशोर-किशोरी एक-दूसरे को अंक में भर लेते हैं। [2]
श्री ललित मोहिनी प्रिया प्रियतम की इस अखंड केली (नित्य विहार) का अवलोकन करती रहती हैं । [3]
मंद मंद झूलत फूलति है, पहिरें बसन सुरंग ॥ [1]
अंग अंग सुख बरषत हरषत, छवि को उठत तरंग ।
सुख में झूलत कुंवर किसोरी, भरि भरि लेत उछंग ॥ [2]
श्री ललितमोहनी प्यारी पिय की निरखत केलि अभंग ॥ [3]
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (66)
प्यारीजी (श्री राधा) प्रियतम (श्री कृष्ण) के साथ रंग (रस-विलास) के हिंडोले पर झूल रही हैं। सुन्दर रंग के वस्त्र धारण किये हुए वे मंद-मंथर गति से झूमती हुई प्रफुल्लित हो रही हैं। [1]
उनके अंग-अंग से आनन्द की वर्षा हो रही है। जब वे हँसती हैं, तो छवि की तरंगें उठने लगती हैं । रस-विलास के इस सर्वोपरि सुख में झूलते हुए ये किशोर-किशोरी एक-दूसरे को अंक में भर लेते हैं। [2]
श्री ललित मोहिनी प्रिया प्रियतम की इस अखंड केली (नित्य विहार) का अवलोकन करती रहती हैं । [3]

