राधे तेरी सदा-सदा की दासी- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (18)

राधे तेरी सदा-सदा की दासी- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (18)

(राग आसावरी त्रिताल)
राधे तेरी सदा-सदा की दासी ।
दीजे अपने टहल-महल की, अब तो भाव खवासी ॥ [1]
शुक पिक मोर, पपीहा सबही, राधा नाम उपासी ।
श्रीगोपालहित लली प्रिया पे, न्यौछावर कमला सी ॥ [2]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (18)

हे राधे, मैं सदा-सदा की आपकी दासी हूँ। कृपया मुझे अपने महल की टहल प्रदान कर, मेरे भाव का पोषण कीजिए एवं, मुझे अपनी निज सेवा प्रदान करें। [1]

आपके श्रीधाम के तोते, मोर, कोयल, पपीहा आदि सभी “राधा” नाम के उपासक हैं। श्री हित गोपालदास जी कहते हैं, “हे प्यारी जू, महालक्ष्मी जैसी देवियाँ भी आप पर न्यौछावर कर देनी चाहिए।” [2]