अपनैं-अपनैं मत लगे वादि मचावत सोर - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (135)

अपनैं-अपनैं मत लगे वादि मचावत सोर - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (135)

अपनैं-अपनैं मत लगे, वादि मचावत सोर ।
ज्यौं-त्यौं सबकौ सेवनें, एकै नंदकिसोर ॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (135)

अपने अलग-अलग मतों को लेकर बेकार में ही सब लोग शोर मचा रहे हैं। जैसे-तैसे, सबको किसी न किसी रूप में, उस एक नंदकिशोर (परम भगवान जो सर्वव्यापक है) का ही तो भजन करना है।