यमुना की कूल पै रही हैं द्रुमबेली झूल - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (21)

यमुना की कूल पै रही हैं द्रुमबेली झूल - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (21)

(कवित्त)
यमुना की कूल पै रही हैं द्रुमबेली झूल,
द्रवें मकरन्द फूल सुषमा दिमानी जू। [1]
तिन पै मुदित मन कूकैं पिक सारी कीर,
सबतें इकन्त रावरी ये राजधानी जू॥ [2]
इनकी छबीली छवि ये जू सुख रासि कछू,
'लाल बलबीर' मुख चहत बखानी जू। [3]
दोउ कर जोर जोर कहूँ बार बार राधे,
कीजिये सुदृष्टिं मोपै वृन्दावन रानी जू॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (21)

श्री धाम वृंदावन में यमुना किनारे वृक्ष एवं लताएँ झूल रही हैं। फूलों से रस टपक रहा है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है। [1]

कोयल, मैना, तोते आदि पक्षी विभोर होकर मधुर कुहक करते हैं। सब धामों से एकांत एवं दिव्य यह श्री राधा रानी की राजधानी है। [2]

श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि इस सुखरासी स्वरूप श्री धाम वृंदावन की सुंदर छवि का कुछ बखान मैं अपने श्रीमुख से करना चाहता हूँ। [3]

हे वृंदावन की महारानी, मेरी राधे जू! मैं दोनों हाथ जोड़कर बार बार केवल यही विनती करता हूँ कि मुझे पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखना। [4]